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‘मेरे गुरूदेव’ बाबा नीब करौरी ‘महाराज’ भाग 6

अनिल पंत, नैनीताल -

नीब करौरी में अपनी लीलायें कर आपने देश के अन्य स्थानों का प्रस्थान किया। उन्होंने भक्ति, योग और सेवा को ही अपना कर्म बनाया। वे आध्यात्मिक महामानव रहे। यहीं से आलौकिक एवं कल्याणमई लीलाओं का शुभारम्भ हुवा। उनकी ईश्वरीयता की कहानियाँ बवनियाँ में रहने के समय से ही अर्थात 1910 से ही सुनी जाती हैं। 1935 के आस-पास आपने किला घाट फतेहगढ़ में गंगा के किनारे वास किया। वहाँ आपने गायें भी पाली जो आपकी आज्ञा का अनुसरण करती हुई आपके दर्शनार्थियों का मनोरंजन भी करती थी। यहाँ आपने अनेक फौजियों को अपने दर्शन से ड्डतार्थ किया और साधू वर्ग से घृणा करने वाले कर्नल का हृदय परिवर्तन कर उसे अपन परम भक्त बना लिया। इसके बाद वे एक स्थान पर कभी नहीं रहे। यह देखने में आया कि नैनीताल आने के पूर्व आप कहाँ-कहाँ गये और क्या-क्या लीलायें देखने में आई कुछ कहा नहीं जा सकता है।
बाबा जी ने कुमाऊँ क्षेत्र में नैनीताल को वर्ष 1936-37 के आस-पास अपनी लीला स्थली के लिए चुना। ये नित्यानन्द मिश्रा जी इतिहासविद लिखते हैं कि नीब करौरी बाबा वर्ष 1937-38 के लगभग नैनीताल आये। उन दिनों लोग उन्हें बहुत कम जानते थे। एक दिन दोपहर के समय में नैनीताल स्थित वर्तमान गोविन्द बल्लभ पन्त चिकित्सालय के सामने देवदार के वृक्ष के नीचे कम्बल ओढ़े बैंच पर बैठे थे। उन दिनों यह चिकित्सालय रामजे अस्पताल के नाम से प्रसिð था। इसके कार्यालय में पं. मुरलीधर पंत मुख्य लिपिक के पद पर थे। दिन में भोजन अवकाश के समय जब वे अस्पताल से कुछ दूरी पर बने अपने आवास की ओर चाय पीने जा रहे थे तो बैंच पर कम्बल ओड़े एक परदेशी बाबा को बैठे देख कर उनका ध्यान बाबा जी की ओर आड्डष्ट हुआ। वे उनकी ओर बढ़े और प्रणाम कर उनसे पूछा, ‘‘महाराज कहाँ से आना हुआ?’’ बाबा ने कहा, ‘‘तू मूरलीधर है ना? हरीराम ने भेजा है।’’ पं. हरीराम जोशी जी मुरलीघर जी की पत्नी के बड़े भाई थे। जोशी जी लखनऊ में एक उच्च पदस्त अधिकारी थे। हरीराम जी बड़े भगवन भक्त थे और आनन्दमयी के प्रिय शिष्यों में से थे। हरीराम जी का नाम सुनते ही मुनलीधर पंत जी महाराज को सम्मान सहित अपने घर ले गये। सर्व प्रथम महाराज जी मुरलीधर जी के आवास पर कुछ महीने रहे और यहीं से उन्होंने अपनी लीला करनी शुरू की। धीरे-धीरे उनकी मान्यता बरेली, हल्द्वानी, अल्मोड़ा, नैनीताल और उत्तरप्रदेश में वृन्दावन, लखनऊ, कानपुर, दिल्ली आदि में होती गई। ग्रामीण एवं मध्यवर्गीय निर्धन लोगों के साथ-साथ मान्य एवं प्रतिष्ठित वर्ग के लोग भी अधिक संख्या में इनके भक्त हो गये। हिन्दू, मुस्लमान, सिख, ईसाई सभी धर्म, जाति और वर्ग के बाल-वृð, स्त्री, पुरूष एवं विदेशी लोगों के आप आराध्य हो गये। राष्ट्रपति वी.वी. गिरी, उपराष्ट्रपति गोपाल स्वरूप पाठक, राज्यपाल कन्हैया लाल, मणिक लाल, वासुदेव मुखर्जी, जुगल किशोर बिड़ला, सुमित्रा नन्दन पंत, अनेक राजनैतिक दल के नेतागण, अंग्रेज जरनल वकत्रा, अमेरीका के डाॅ. रिचर्ड एल्पर्ट आदि लोग इनके भक्त हो गये। प्रधानमंत्री जवाहरल लाल नेहरू को बाबा के दर्शन श्री भगवान सहाय के माध्यम से हुए। महाराज के जो भी भक्त बने वे परिवार सहित बने। नैनीताल के आस-पास उनकी बहुत मान्यता हुई और ‘महाराज’ नाम से प्रचलित हुए। उन्होंने घर-घर में अखण्ड रामायण पाठ विशेषकर सुन्दर काण्ड तथा हनुमान चालिसा का पाठ करवाना आरम्भ किया और जन-जन तक हनुमान जी के प्रति निष्ठा, श्रðा तथा प्रेम का संचार कर दिया। कहते हैं कि देवभूमि में हनुमान जी के मंदिर नहीं के बराबर थे। यहाँ केवल शिवालय एवं देवालय की ही अधिकता थी। महाराज जी ने भक्तों के अत्यधिक प्रेम व समर्पण को देखते हुए यहाँ मनोरा पर्वत स्थित बजरी के टीले पर संकटमोचन हनुमान मंदिर की स्थापना वर्ष 1953 में की। महाराज की अलौकिक लीलाओं का महाभाग प्राप्त उत्तराखण्ड की इस देव भूमि में उनके द्वारा स्थापित यह प्रथम हनुमान मंदिर है। यहाँ पर यह भी बताना चाहूँगा कि हमारे बुजुर्ग बताते थे कि बहुत पहले इसी टीले पर हैड़ाखान महाराज द्वारा कहा गया था कि एक दिन अंजनी का लाल आकर यहाँ पर हनुमान जी का मंदिर बनायेगा। इसके पश्चात महाराज द्वारा भूमियाधार हनुमान मंदिर, कैंचीधाम हनुमान मंदिर एवं काकड़ीघाट का मंदिर बनाया गया। फिर पिथौरागढ़, धारचुला आदि मंदिर बनाये। इस तरह उनके द्वारा स्थापित 108 हनुमान मंदिर भारत में हैं। ड्डपा और करूणा की मूर्ति महाराज जगत पिता थे। महाराज ने जितने भी मंदिर बनवाये वे सब ट्रस्ट को सौंप कर आगे बढ़ते गये। वे स्वतः लोगों के घरों में जाकर अपनी आलोकिक शक्ति से उनका उðार करते। वे किसी को दुखी नहीं देख पाते थे। असम्भव उनके लिये कुछ भी न था। नीब करौरी में अपनी लीलायें कर आपने देश के अन्य स्थानों का प्रस्थान किया। उन्होंने भक्ति, योग और सेवा को ही अपना कर्म बनाया। वे आध्यात्मिक महामानव रहे। यहीं से आलौकिक एवं कल्याणमई लीलाओं का शुभारम्भ हुवा। उनकी ईश्वरीयता की कहानियाँ बवनियाँ में रहने के समय से ही अर्थात 1910 से ही सुनी जाती हैं। 1935 के आस-पास आपने किला घाट फतेहगढ़ में गंगा के किनारे वास किया। वहाँ आपने गायें भी पाली जो आपकी आज्ञा का अनुसरण करती हुई आपके दर्शनार्थियों का मनोरंजन भी करती थी। यहाँ आपने अनेक फौजियों को अपने दर्शन से ड्डतार्थ किया और साधू वर्ग से घृणा करने वाले कर्नल का हृदय परिवर्तन कर उसे अपन परम भक्त बना लिया। इसके बाद वे एक स्थान पर कभी नहीं रहे। यह देखने में आया कि नैनीताल आने के पूर्व आप कहाँ-कहाँ गये और क्या-क्या लीलायें देखने में आई कुछ कहा नहीं जा सकता है।
बाबा जी ने कुमाऊँ क्षेत्र में नैनीताल को वर्ष 1936-37 के आस-पास अपनी लीला स्थली के लिए चुना। ये नित्यानन्द मिश्रा जी इतिहासविद लिखते हैं कि नीब करौरी बाबा वर्ष 1937-38 के लगभग नैनीताल आये। उन दिनों लोग उन्हें बहुत कम जानते थे। एक दिन दोपहर के समय में नैनीताल स्थित वर्तमान गोविन्द बल्लभ पन्त चिकित्सालय के सामने देवदार के वृक्ष के नीचे कम्बल ओढ़े बैंच पर बैठे थे। उन दिनों यह चिकित्सालय रामजे अस्पताल के नाम से प्रसिð था। इसके कार्यालय में पं. मुरलीधर पंत मुख्य लिपिक के पद पर थे। दिन में भोजन अवकाश के समय जब वे अस्पताल से कुछ दूरी पर बने अपने आवास की ओर चाय पीने जा रहे थे तो बैंच पर कम्बल ओड़े एक परदेशी बाबा को बैठे देख कर उनका ध्यान बाबा जी की ओर आड्डष्ट हुआ। वे उनकी ओर बढ़े और प्रणाम कर उनसे पूछा, ‘‘महाराज कहाँ से आना हुआ?’’ बाबा ने कहा, ‘‘तू मूरलीधर है ना? हरीराम ने भेजा है।’’ पं. हरीराम जोशी जी मुरलीघर जी की पत्नी के बड़े भाई थे। जोशी जी लखनऊ में एक उच्च पदस्त अधिकारी थे। हरीराम जी बड़े भगवन भक्त थे और आनन्दमयी के प्रिय शिष्यों में से थे। हरीराम जी का नाम सुनते ही मुनलीधर पंत जी महाराज को सम्मान सहित अपने घर ले गये। सर्व प्रथम महाराज जी मुरलीधर जी के आवास पर कुछ महीने रहे और यहीं से उन्होंने अपनी लीला करनी शुरू की। धीरे-धीरे उनकी मान्यता बरेली, हल्द्वानी, अल्मोड़ा, नैनीताल और उत्तरप्रदेश में वृन्दावन, लखनऊ, कानपुर, दिल्ली आदि में होती गई। ग्रामीण एवं मध्यवर्गीय निर्धन लोगों के साथ-साथ मान्य एवं प्रतिष्ठित वर्ग के लोग भी अधिक संख्या में इनके भक्त हो गये। हिन्दू, मुस्लमान, सिख, ईसाई सभी धर्म, जाति और वर्ग के बाल-वृð, स्त्री, पुरूष एवं विदेशी लोगों के आप आराध्य हो गये। राष्ट्रपति वी.वी. गिरी, उपराष्ट्रपति गोपाल स्वरूप पाठक, राज्यपाल कन्हैया लाल, मणिक लाल, वासुदेव मुखर्जी, जुगल किशोर बिड़ला, सुमित्रा नन्दन पंत, अनेक राजनैतिक दल के नेतागण, अंग्रेज जरनल वकत्रा, अमेरीका के डाॅ. रिचर्ड एल्पर्ट आदि लोग इनके भक्त हो गये। प्रधानमंत्री जवाहरल लाल नेहरू को बाबा के दर्शन श्री भगवान सहाय के माध्यम से हुए। महाराज के जो भी भक्त बने वे परिवार सहित बने। नैनीताल के आस-पास उनकी बहुत मान्यता हुई और ‘महाराज’ नाम से प्रचलित हुए। उन्होंने घर-घर में अखण्ड रामायण पाठ विशेषकर सुन्दर काण्ड तथा हनुमान चालिसा का पाठ करवाना आरम्भ किया और जन-जन तक हनुमान जी के प्रति निष्ठा, श्रðा तथा प्रेम का संचार कर दिया। कहते हैं कि देवभूमि में हनुमान जी के मंदिर नहीं के बराबर थे। यहाँ केवल शिवालय एवं देवालय की ही अधिकता थी। महाराज जी ने भक्तों के अत्यधिक प्रेम व समर्पण को देखते हुए यहाँ मनोरा पर्वत स्थित बजरी के टीले पर संकटमोचन हनुमान मंदिर की स्थापना वर्ष 1953 में की। महाराज की अलौकिक लीलाओं का महाभाग प्राप्त उत्तराखण्ड की इस देव भूमि में उनके द्वारा स्थापित यह प्रथम हनुमान मंदिर है। यहाँ पर यह भी बताना चाहूँगा कि हमारे बुजुर्ग बताते थे कि बहुत पहले इसी टीले पर हैड़ाखान महाराज द्वारा कहा गया था कि एक दिन अंजनी का लाल आकर यहाँ पर हनुमान जी का मंदिर बनायेगा। इसके पश्चात महाराज द्वारा भूमियाधार हनुमान मंदिर, कैंचीधाम हनुमान मंदिर एवं काकड़ीघाट का मंदिर बनाया गया। फिर पिथौरागढ़, धारचुला आदि मंदिर बनाये। इस तरह उनके द्वारा स्थापित 108 हनुमान मंदिर भारत में हैं। ड्डपा और करूणा की मूर्ति महाराज जगत पिता थे। महाराज ने जितने भी मंदिर बनवाये वे सब ट्रस्ट को सौंप कर आगे बढ़ते गये। वे स्वतः लोगों के घरों में जाकर अपनी आलोकिक शक्ति से उनका उðार करते। वे किसी को दुखी नहीं देख पाते थे। असम्भव उनके लिये कुछ भी न था।