हमारे लेखक

‘मेरे गुरूदेव’ बाबा नीब करौरी ‘महाराज’ भाग 8

अनिल पंत, नैनीताल -
महाराज जी के अनन्य भक्तों में से एक भक्त ऐसे भी हैं जिन्हें महाराज ने आदेशित किया था कि वे विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO)  में शामिल होकर चेचक उन्मूलन के महान कार्य को करें और उसका नेतृत्व करंे। ऐसे भक्त गूगल आर्ग के निदेशक रह चुके लैरी ब्रिलियट की महाराज जी से मिलने की कहानी उनकी ही जुबानी-
मेरी पत्नी (गिरिजा ब्रिलियट) महाराज जी से मिल चुकी थी और अब मुझे ले जाने के लिये अमेरिका लौट आई थी। पहली बार जब मैं महाराज जी जी से मिला उसकी कहानी इस प्रकार है
पश्चिम के मतवाले लोग एक बूढ़े से मोटे आदमी को घेरे हुए थे। जिसने कम्बल ओढ़ रखा था। मुझे यह देख कर बहुत नफरत हुई कि यहाँ मौजूद पश्चिमी लोग उस बूढ़े के पैर छू रहे थे। पहले दिन तो उन्होंने मुझ पर कोई ध्यान नहीं दिया। लेकिन इसी तरह एक, दो, तीन नहीं पूरे सात दिन मेरी उपेक्षा करते रहे तो मैं काफी खिन्न हुआ। न मुझे वहाँ कुछ महसूस हो रहा था और न उस बूढ़े आदमी के लिये मेरे मन में कोई मोहब्बत थी। मैंने महसूस किया कि मेरी पत्नी किसी उन्मादी समूह में फँस गई है। इसलिये एक हफ्ते बाद मैं वापस लौटने की तैयारी करने लगा।
हम नैनीताल के एक होटल में ठहरे हुए थे। आठवें दिन मैंने अपनी पत्नी से कहा कि मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा है। शाम को झील के किनारे टहलते हुए मुझे महसूस हुआ कि मेरी पत्नी किसी ऐसी जगह मसगूल हो गई है जिसमें मैं शामिल नहीं हूँ। ऐसे में निश्चित रूप से मेरा विवाह टूट जायेगा। मैंने फूल, पेड़, पहाड़, झील सबकी तरफ देखकर मन बहलाने की कोशिश की लेकिन मेरा डिप्रेशन कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था। इसके बाद मैंने कुछ ऐसा किया जो जवानी में अब तक मैंने कभी नहीं किया था। मैंने प्रार्थना की, मैंने भगवान से पूछा, ‘मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ? यह आदमी कौन है जिसके लिए लोग इतने मतवाले हो गये हैं?’ तभी मेरे जेहन में आया कि विश्वास के लिए चमत्कार का होना जरूरी है। मैंने भगवान से कहा,‘ठीक है मुझमें कोई श्रðा नहीं है। आप चमत्कार कीजिये।’ मैं आकाश में इन्द्रधनुष की तरफ देखने लगा। कुछ नहीं हुआ। मैंने तय किया कि अगले दिन मैं यहाँ से चला जाऊँगा। कैंची मंदिर के लिये, अगले दिन विदा लेने के मन से हमने टैक्सी मंगवाई। मैंने मन में तय किया कि मैं महाराज को साफ बता दूँगा कि मुझे वो पसंद नहीं आये। हम सुबह-सुबह जब कैंची पहुँचे तब तक वहाँ लोग नहीं आये थे। हम बरामदे में उनके तखत के सामने बैठ गये। महाराज जी अभी कमरे के बाहर नहीं आये थे। तखत पर कुछ फल रखे थे जिनमें से एक सेब जमीन पर गिर गया था। मैं उसे उठाकर तखत पर रखने के लिए झुका तभी महाराज जी बाहर आ गये। उन्होंने अपने हाथ को मेरे सिर पर रख कर और जमीन की तरफ दबाव से झुका दिया। मेरे शरीर की ऐसी स्थिति बन गई कि मैं घुटने के बल झुक कर उनके पैरों को छू रहा था जबरदस्ती बिना किसी भाव के। यह सब कितना उट पटांग था। फिर उन्होंने मुझसे पूछा,‘‘कल कहाँ थे? लेक पर थे?’’ उन्होंने लेक शब्द अंग्रेजी में कहा। जब उनके मुँह मैंने लेक शब्द सुना तो शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गई। मैं बहुत अजीब सा महसूस कर रहा था। उन्होंने फिर पूछा,‘‘लेक पर क्या कर रहे थे?’’
मैं स्तब्ध था। फिर उन्होंने खुद ही कहा,‘‘घुड़सवारी कर रहे थे?’’
‘नहीं’
‘नौका चला रहे थे?’
‘नहीं’
‘तैराकी कर रहे थे?’
‘नहीं’
फिर वो मेरी तरफ झुके और धीरे से बोले,‘‘भगवान से बातें कर रहे थे?’’ जब उन्होंने ये आखिरी वाक्य कहा तो मैं गिर पड़ा और बच्चे की तरह रोने लगा। उन्होंने मेरी दाढ़ी पकड़ कर उठाते हुए कहा,‘‘क्या तुमने कुछ माँगा?’’ यह मेरे लिए मेरी दीक्षा जैसी थी। तब तक और लोग वहाँ आने लगे थे। वो सब मुझे बड़े दुलार भाव से देख रहे थे। मुझे लगा आज जो मेरे साथ हो रहा है इन लोगों के साथ पहले हो चुका है। एक तुच्छ सा सवाल,‘‘क्या तुम कल झील के किनारे गये थे?’’ जिसका किसी और के लिए कोई मतलब नहीं हो सकता था। उसने वास्तविकता की मेरी धारणा को छिन्न-भिन्न कर दिया। यह स्पष्ट हो गया था कि महाराज जी हर भ्रम के बीच सत्य को देखते हैं। वे सब कुछ जानते हैं। इसके बाद उन्होंने मुझसे पूछा,‘‘क्या तुम एक किताब लिखोगे?’’
यह मेरा स्वागत था। इसके बाद अब उनके पैरों को मैं अपने हाथ से दबाना चाहता था।
लैरी ब्रिलियंट
इस तरह महाराज जी ने लैरी की जिन्दगी ही बदल दी और वे जन सेवा में लगे रहे।
‘बाबा तेरे लीला गुन जाने नहीं पायो कोई।
जाने है वही जाको तैने ही जनायो है।।’