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”खु खो ले“

”खु खो ले“
हेमन्त बिष्ट, खुर्पाताल
एक प्राइवेट टेलीकाॅम कम्पनी का पोस्ट पेड कार्यालय। एक छोटा सा कमरा लेकिन इतना व्यवस्थित कि चार-पाँच लोग एक साथ कार्य कर रहे हैं। फाइलें भी हैं, माॅनिटर्स भी हैं, कम्प्यूटर के सम्मुख फार्मों का ढेर लेकिन सब कुछ इतना व्यवस्थित कि काम की थकान का अनुभव हो ही नहीं सकता।
मैं कार्यालय पहुँचा। सभी से यथा योग्य अभिवादन हुआ। सभी ने आत्मीयता से नमस्कार कहा और फिर अपने-अपने कार्यो में व्यस्त। कस्टमर्स आते रहे, नपी तुली बातें, उनकी समस्या का निदान, कस्टमर की नाराजगी भी हुई तो उसे विलंब का या काम न हो पाने का कारण शालीनता से बता देना, कार्य पद्वति का हिस्सा था।
गोविंद, जो मेरा विद्यार्थी रहा मेरे समीप आकर बैठ जाता है, ”सर क्या मदद कर सकता हूँ?“ मेरा उत्तर, ”बेटा, ये कम्युनिकेशन क्रांति ने हम लोगों को फिर से अनपढ़ बना दिया है। ये ”फेस-बुक, व्हट्स एप, यू-ट्यूब..... कहीं अटक गए तो असहाय महसूस करते हैं। स्वयं को, हम बड़ी उम्र के लोग“। गोविंद भण्डारी का संक्षिप्त सा उत्तर,“ अरे नहीं सर, आजकल छोटे-छोटे बच्चे मोबाइल को ऐसे हैण्डल करते हैं कि हम स्वयं को उनके बहुत पीछे पाते हैं “। मुझमें थोड़ा आत्म विश्वास बढ गया है। मैं अपनी परेशानी शेयर करने लगा हूँ। गोविंद भीतर बैठी किरन, भारती और कमला से मुखातिब होते हुए कहते हैं, ”सर जब पढ़ाते थे ना तो बेसिक फन्डामेण्टल्स पर बहुत काम करते थे, तभी जीव विज्ञान पढने का बहुत आनन्द आता था“। किरन और भारती की नजर कम्प्यूटर्स और फाइलों पर है लेकिन जवाब, ”तो आज सर की मैथड सर पर एप्लाई करो, फ्लो चार्ट बनाकर स्टैप वाइज समझाओ कैसे, हाॅट स्पाट से, नेट का यूज होता है।“ संतुष्ट होकर मैं बाहर आता हूँ इस आश्वासन के साथ कि कल सुबह फिर आऊंगा यदि कोई दिक्कत हुई तो.......
अगले दिन कार्यालय में रंगीन-गुब्बारे .......फूलों की सजावट..............। भीतर प्रविष्ट होते ही मैं पूछता हूँ कोई खास ओकेजन था क्या? भारती थोड़ा शरमा रही है लेकिन सभी अपने काम में व्यस्त, गोविंद भण्डारी के हिस्से का काम किरन कर रही है और अब तक जो किरन का काम था उसे भारती और कमला ने पूरा कर लिया है। मैंनें पूछा, ”आज ये सीटें क्यों बदली हैं? उत्तर था, एक जरुरी काम के कारण, आॅफिस का काम थोड़ा बाधित रहा अब जब काम लेबल हो जाएगा तो सभी अपने-अपने स्थानों पर आ जाएंगे।
आपसी सहयोग और काम के प्रति समर्पण देखकर मुझे लगा हमने इन बच्चों से सीखना चाहिए, काम कैसे होता है। तभी गोविंद मेहरा, तिलक चंदन लगा कर कार्यालय में प्रविष्ट होते हैं। हाथ में मिठाई का डिब्बा है। मैं प्रश्नवाचक दृष्टि से पुनः देखता हूँ और याद करने लगता हूँ कि कल जब मैं साढ़े पांच बजे बाद इधर से गुजर रहा था तो गोविंद भण्डारी और किरन इस कार्यालय में थे जबकि कार्यालय 5ः00 बजे बंद होता है। मैंने पुनः पूछा,”बेटा आप दोनों तो कल देर तक यहाँ थे, और लोगों के जाने के बाद।“ गोविंद और किरन बोले,“ सर हम भारती मैडम और गोविंद जी को सरप्राइज देना चाहते थे कि आज आफिस खुले तो ये सरप्राइज हों। हमने शाम ही आफिस सजा दिया था। सुबह शटर खुला तो...............“ मेरा कौतुहल बढा......... मैंने पूछा पूछना चाहा कि.........। तभी कमला जी बोली आज भारती मैम और मेहरा सर की वैंडिंग एनिवर्सरी है। गोविंद बोला, ” सर ये छोटी-छोटी बातें हमारे जीवन को सरस बना देती हंै। किरन बोली, ”खुशी के पल साथ बिताने में खुशी बढ़ जाती है“। मैंने पाया काम उसी गति स ेचल रहा था और खुशी उससे दुगुनी गति से मिल रही थी। फिर से गोविंद भण्डारी कहने लगा, ”सर रोजमर्रा के जीवन के बीच ही तो खुशी खोजनी है। अगर अलग से खुशी खोजने निकले तो फिर खुशी ही खोजते रह जाएंगे। काम वैसे का वैसा ही रह जाएगा। जब काम वैसे ही रह जाएगा खुशी का आनन्द कैसे आएगा।
मुझे लगा कि मैं कक्षा में बैंच पर बैठा हूँ और गोविंद ब्लैक बोर्ड पर खड़ा होकर पढ़ा रहा है। खुशी और गर्व से मेरी आँखें सजल हो गईं। मैंने बैग से डायरी और पैन निकाली और डायरी में अंकित किया, ”खु खो ले“। गोविंद पूछने लगा, सर आपने यह डायरी में क्या नोट किया? ”खु खो ले“ मैंने कहा, कुछ याद रखने के लिए शार्ट में खुखोले लिखा है। गोविंद पुनः बोला, सर जब आप बायो पढ़ाते थे तो श्वसन वाले चैप्टर में अंतः श्वसन में क्रैब्स चक्र याद कराने के लिये पहले ब्लैक बोर्ड पर लिखते थे OCCI OKSS FM जिसका फुल फार्म होता था, ओक्सेलो-एसिटिक एसिड- साइट्रिक एसिड, सिस एकोनिटिक एसिड, ,आइसो साइट्रिक एसिड............. गोविंद एक सांस में बोलता गया और भारती, किरन, कमला, गोविंद मेहरा जी विस्मय से सुनते रहे। और एक साथ बोल पड़े, ”आज तक याद है?“ मैंने कहा, ‘खु खो ले’ का फुल फार्म भी ”एक दगडि़या“ साप्ताहिक पत्र में पढ़ लेना।
आज जब मैं लिखने बैठा हूँ तो गोविंद के कहे शब्द याद आ रहे हैं कि सर रोजमर्रा के व्यस्त जीवन में काम के साथ-साथ खुशी खोज लेनी पड़ती है। और मैं ”खु खो ले“ का फुल फार्म लिख रहा हूँ- खुशी खोज लेना।