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‘मेरे गुरूदेव’ बाबा नीब करौरी ‘महाराज’ अनंत चैदस 27/9/2015 महाराज जी के निर्वाण दिवस पर विशेष

अनिल पंत, नैनीताल -
बाबा नीब करौरी महाराज के बारे में कुछ भी लिखा जाये वह कम है। वे एक अवतारी पुरूष रहे और जग के तारण के लिये ही उन्होंने अवतार लिया ;जन्म लियाद्ध। सिð पुरूष किसी कार्य विशेष के लिये ही जन्म लेते हैं।
‘‘जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार।
की तुम अखिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार।।’’
बाबा जी का जन्म आगरा जनपद के नागऊ ग्राम समुह के एक गाँव अकबरपुर, जो कि उत्तर प्रदेश में है, में एक समृð बाहमण परिवार में पंडित दुर्गाप्रसाद ‘‘वेदाचार्य’’ जी के घर में हुआ। उनका नाम पं0 लक्ष्मी नारायण शर्मा था। ग्यारह वर्ष की उम्र में उनका विवाह रामवेटी पु0 पं0 रेवती राम से हुआ। उनके दो पुत्र में अनंग सिंह शर्मा और धर्मनारायण शर्मा व एक पुत्री गिरजा हैं।
महाराज जी की अकबर पुर में दो हवेलिया हैं तथा आगरा के गोकुल पुरा में एक अन्य मकान है जहाँ वे शादी के बाद अक्सर जाया करते थे। उनका भरा पूरा परिवार है। जिसमें 9 पोते पोती और 15 पड़पोते पोती हैं।
उन्होंने कई बार अपना घर बार छोड़ दिया था। यूँ कहो वे घर से भाग जाया करते थे। फिर कई बार उन्हें पकड़ कर पुनः घर लाया जाता था। उन्होंने अपना घर तब छोड़ा जब उनकी पुत्री की उम्र 11 साल की थी। साधू के रूप में वे अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग नामों से जाने जाने लगे। कहीं पर हंडी वाले बाबा और कहीं पर तिकोनिया वाला बाबा आदि। जब वे बवनिया गुजरात में तपस्याधीन और साधनारत रहे। वहीं किसी वैष्णव संत ने कौपीन धारण कराकर लक्ष्मण दास नाम दिया। इस अवधि में वे अधिकतर वहाँ एक तालाब में रहकर साधना करते थे और वहीं से वे तलैया बाबा के नाम से पुकारे जाने लगे। बाबनिया से उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों का भ्रमण किया। आप इस यात्रा में जिला फरूखाबाद के ग्राम नीब करौरी पहुँचे, जहाँ आपने विश्राम किया। आपकी वाणी दिव्य थी। जो भी शब्द आपके मुँह से निकल जाते सत्य घटित होते। इस कारण ग्रामवासियों का बाबा लक्ष्मणदास से लगाव हो गया। इन लोगों ने आपको अपने गाँव में ही रोक लिया और आपकी सुविधा के लिये आपके लिये जमीन के नीचे एक गुफा बना दी। वे इसी के अन्दर साधना में लीन रहते थे। कालांतर में यह गुफा नष्ट हो गई है। इसी के कुछ दूरी पर एक दूसरी गुफा का निर्माण किया गया जो आज भी सुरक्षित है। इस गुफा की ऊपरी भूमि पर बाबा ने मंदिर बनवाया। जिसकी प्रतिष्ठा में एक महीने का महायज्ञ किया। इस अवसर पर आपने अपनी जटायें भी उतरवा दीं और मात्र एक धोती धारण की जो आधी पहनते और आधी ओढ़ते थे। यहाँ गोपाल नामक एक तिरस्ड्डत बहेलिया आपका भक्त हो गया और नित्य सेवा के लिये गुफा में आता था। एक दिन गोपाल से भूल हो गई। उसे बाबा की आज्ञा का ध्यान नहीं रहा और व दूध का लोटा लिये गुफा के अन्दर प्रवेश कर गया। भीतर जाते ही वह त्रासित हो गया। वहाँ खड़े रहने की उसमें सामथ्र्य नहीं थी। उसने बाबा को सर्पाें से लिपटे समाधि में लीन देखा। उनके इस शिव रूप को देखकर उसके हाथ से दूध का लोटा गिर गया और वह बाहर भाग आया और बेहोश होकर गिर गया। बाबा ने बाहर आकर उसे उठाया। उनके स्पर्श से उसमें चेतना आ गई। वे उससे कहने लगे, ‘‘बिना आज्ञा के तुम्हें गुफा के अन्दर नहीं आना चाहिए था।’’ नीब करौरी गाँव में ही उन्हें श्री श्री 1008 परम हंस बाबा लक्ष्मण दास की पदवी भी दी गयी जो कि भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में सर्वोच्च मानी जाती है। यहीं से बाबा नीब करौरी ‘महाराज’ के रूप में अवतरित हुए।