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‘मेरे गुरूदेव’ - बाबा नीब करौरी ‘महाराज’

संस्मरण:
अनिल पंत, नैनीताल -
उत्तराखण्ड के इस क्षेत्र को महाराज देव भूमि कहते थे और अक्सर अपने परम् भक्तों से मिलने यहाँ अचानक आ जाते। कभी - कभी तो वो वहाँ रूक भी जाते। महाराज के अचानक आगमन की सूचना पर स्त्री, पुरूष, युवा, बालक सब उनके दर्शनों को लालायित रहते और एक दूसरे से पूछते ‘कां छन’ (कहाँ हैं) और सूचना पाकर नियत स्थान या घर पर वे चरणों में पहुँच जाते। यहाँ महाराज जी को निष्ठावान धार्मिक प्रवृति के लोग मिल जाते, जिनके बीच महाराज ने अपनी कल्याणमयी लीलायें की। भक्त भी अपने गुरूवर के प्रति नतमस्तक हो गये। महाराज के प्रेम, दया, करूणा, कृपा की उनके भक्तों पर गहन छाप पड़ गई। इतनी आत्मीयता का आदान प्रदान तो अपने परिवार में भी नहीं चल पाता जितना महाराज के प्रति चलता। महाराज जिस भक्त के घर चले जाते वहाँ अपने आप भंडारा हो जाता तथा हनुमान चालिसा और सुन्दर काण्ड का पाठ होता।
हम लोग भी बाल्यकाल में महाराज के पीछे डोलते रहते या यूँ कहो प्रसाद (भण्डारे) के लिये भागते रहते। उस वक्त ये कोई नहीं जान पाया कि महाराज क्या हैं। आज आभास होता है कि महाराज सर्वशक्तिमान थे। घर-घर की बात जानते थे और अपने भक्तों के दुखों के निवारण के लिये ही यहाँ आकर अपनी लीला करते थे। महाराज ने गुरू बनकर किसी को साधना नहीं कराई और न ही कोई गुरू मंत्र दिया। केवल मन साधना हेतु मार्ग दर्शन दिया। ना ही गुरू या व्यास रूप में उन्होंने कोई प्रवचन ही दिया। मंदिरों, आश्रमों आदि में अधिकांश दर्शनार्थियोें के लिये प्रसाद पाओ का नियम था। महाराज जिस घर में भी जाते वहाँ भक्तों की भीड़ लग जाती और थोड़ा बहुत भंडारा भी हो जाता। यह सब कैसे होता था यह एक रहस्य ही रहा। आज भी महाराज के मंदिरों में इसी तरह भंडारा होता रहता है। महाराज की समस्त लीलायें उनकी जन-जन के प्रति दया, क्षमा का ही निरूपण करती। अपनी इस दया, क्षमा को रूप-स्वरूप देने के लिये कोई भी विधान नियम, कोई भी अचार संहिता आदि उनके आड़े नहीं आती थी। एक बार कैंची आश्रम में गायत्री महायज्ञ के अंतिम दिन अनेक गाँवों से हजारों की संख्या में ग्रामीण जनता, बाल, वृð, युवक-युवती आदि भंडारा (प्रसाद) पाने के लिए आश्रम के प्रांगण मेें सुबह से ही एकत्र होने लगे थे, परंतु कर्म काण्डियों द्वारा विधाओं की पूर्ति में अत्यन्त विलम्ब के कारण दोपहर बाद तक भी भंडारा प्रारम्भ न हो सका। अपनी कुटी में बैठ बाबा जी जान गये कि गरीब जनता, जिसके लिये यह कर्मकाण्ड मात्र एक पूजन था, भूख से व्याकुल हो चली है। उन्होंने आश्रम के आदरजनोें से बुलाकर पूछा कि ‘‘क्या देर है भंडारे में?’’ तो उत्तर मिला ‘‘महाराज अभी पूर्णाहुति नहीं हुई है।’’ बिगड़ गये दयानिधान, डाँठ कर बोले ‘‘क्या होती है पूर्णाहुति। जब इतनी आत्मायें भूखी बैठी हैं। पूजा का योग निकाल कर खिलाओ इन सब को।’’ ऐसा ही किया गया।
इनमें से कितनों ने अन्तर में पुकारा होगा ‘‘महाराज बड़ी भूख लगी है प्रसाद पवाईये।’’ (अनंन्त कथामृत से)
ऐसे हैं करूणानिधान। आज भी महाराज के सभी आश्रमों में मंदिरों में पूजा पाठ, कर्मकाण्ड, रामायण आदि में बिना पारायण के भोग लगा कर महाराज की आज्ञानुसार प्रसाद (भंडारे) का वितरण हो जाता है।
करें सदा सन्तन की सेवा।
तुम सब विधि सब लायक देवा।
क्रमशः