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47 लाख की ब्लैकमनी

47 लाख की ब्लैकमनी
आबाद जाफ़री, नैनीताल
1975 में जगदीश शरण सक्सेना ‘राज’ असिस्टेन्ट सेल्स टैक्स कमिश्नर (ज्यूडिशियल) के ओहदे पर नैनीताल आये। उनका कार्यालय मैट्रोपोल होटल के ऊपर वाले काटेज में था। वह खानदानी शायर थे। उर्दू शायरी उन्हंे अपने पिता शमीम करहलवी से विरासत में मिली थी। उर्दू शायरी का उच्च स्तरीय ज्ञान था। वह अपने पिता के शागिर्द थे। करहल जिला मैनपूरी के बाशिन्दे थे, इसलिए ‘राज करहलवी’ के नाम से मशहूर हुए।
मैं अपने परम्परागत लिबास की वजह से स्थानीय उर्दू शायरों में जल्दी मकबूल हो गया था। उस वक्त तक (अर्थात 1975) मैंने पतलून (पेंट) पहनना शुरू नहीं किया था। शेरवानी, कुर्ता, पाजामा और पैरों में सलीमशाही, यही मेरा लिबास था। नैनीताल के नौजवानों में इस हुलिये का मैं अकेला इंसान था। कालेज मंे भी मेरा यही लिबास था और विशेष रियायत की वजह से मुझ पर ड्रेस कोड लागू नहीं था।
एक रोज स्कूल में एक व्यक्ति ने आकर मुझे उर्दू का पत्र दिया। उसमें इतवार के रोज शाम 5 बजे रजाक्लब मंे होने वाले मुशायरे में मुझे आमन्त्रित किया गया था। पहली बार मैं शरीक हुआ। वहाँ मालूम हुआ कि नैनीताल मंे लगभग 35 लोग शायर हैं। लेकिन सच्चे शायर 15 या 16 ही थे। बाकी किसी न किसी से शेर लिखवा पढ़ा करते थे (उर्दू शायरी मंे ऐसे शायरों को ‘मुताशायर’ कहा जाता है और यह तौहीन आमेज़ शब्द है)। उस मुशायरे में ‘राज’ साहब को सुना। यह मेरी पहली मुलाकात थी। रुख़सत के वक्त उन्हांेने मुझे अपने निवास का फोन नम्बर देते हुए सुविधानुसार चाय पर आमंत्रित किया। जाकिर भारती जब भी मुझे मिलते तो राज साहब का जिक्र करते और कहते कि ‘तुम्हंे बहुत याद करते हैं, मिल आओ’।
एक दिन मैं ने बड़े बाजार में टण्डल क्लाथ स्टोर (अब शिवा रेस्टोरेन्ट) से उन्हें फोन किया। उस जमाने मे कुछ प्रतिष्ठित लोगों या प्रतिष्ठानों मंे ही फोन होते थे, जो कभी-कभार प्रयोग में आते थे। लोग खुशी-खुशी फोन की अनुमति देते थे, क्यांेकि फोन कम होने की वजह से फ्री कालें बची रह जाती थीं। मुलाकात का वक्त तय हो गया।
मै उनके निवास स्थान ‘इस्लामियाँ गैस्ट हाउस (निकट बैंक आफ़ बड़ौदा) पहुँच गया। वह आफिस से आकर चाय पर मेरा इन्तजार कर रहे थे। राहो रस्म के पश्चात बात शायरी पर आ गयी। उस वक्त मेरी दाढ़ी-मोछें नही निकली थीं। बस मसें भीग रही थीं। मेरे शेरों की तारीफ करते हुए कहने लगे, खानदानी शायर हो वरना इतनी कम उम्र में ऐसे पुख्ता शेर मुश्किल हैं। उन्होंने मुझे बतलाया कि उनका मजमू-ए-कलाम (काव्य संग्रह) पे्रस को जा रहा है, तुम उसे एक नजर देख लो, सबने तुम्हारा ही नाम लिया है। लोग तुम्हारी उर्दू से प्रभावित हैं। वास्तविकता यह है कि वह खुद उर्दू-फारसी के ज्ञाता थे। उनका लेख बहुत खूबसूरत और पुख्ता था। मगर यह उनकी इज्जत अफ़जाई और कद्रदानी थी कि मुझे उन्होंने यह जिम्मेदारी सौंपी। यहाँ से जो शुरुआत हुई तो उनकी जिन्दगी तक रिश्ते गहरे होते चले गये। यहाँ तक कि मैं उनके घर का अटूट हिस्सा बन गया। उनका एक बेटा था और एक बेटी। बेटी की शादी कर दी और वह अपने शौहर के साथ जापान जाकर सेटिल हो गयी। बेटा इलाहाबाद में वकालत करने लगा और वहीं उसने क्लाइव रोड पर कोठी खरीद ली।
उस दौर में कई व्यापारियों ने उनसे मेरे सम्बन्धों का फायदा उठाया। कोई न कोई बड़ा व्यापारी मेरे स्कूल आकर मदद का आग्रह करता। जबकि मेरा उससे कोई सम्बन्ध नहीें होता था। मैं एक पर्चे पर व्यापारी का नाम लिखकर उन्हंे दे देता और अपील की तारीख भी। वह मेरे बतलाये व्यापारियों पर नाममात्र के जुर्माने के साथ अपील निस्तारित कर दिया करते थे।
1978 में उनका स्थानांतरण कानपूर हो गया। वहाँ वह कमिश्नर के पद पर गये। उनके स्थानन्तरण पर लोगों ने उनसे किनारा कर लिया मगर मंैने उनकी विदाई पर एक कार्यक्रम कर डाला। विदाई समारोह से दो दिन पहले मुझे घर बुलवाया और दो व्यापारियों से मिलने को कहा। मेरी समझ मे नही आया कि वह व्यापारियों से मिलने के लिए क्यांे कह रहे हैं। मैं उन स्थानीय व्यापारियों से मिला। दोनों जगह से एक-एक लिफाफा मिला। मैंने लाकर उन्हें दे दिये। उन्होंने अपनी पत्नी से कहा, ‘‘इस बेवकूफ को समझाओ।’’ मुझे उनकी पत्नी ने बताया कि इन लिफाफांे से तुम्हारे कार्यक्रम के लिए सहयोग राशि है। उन लिफाफांे में बारह सौ रुपये थे। जो उस जमाने मंे एक बड़ी भारी रकम थी।
कानपुर से वह मुझे बराबर पत्र लिखते रहते थे। मैंने उन पर एक लेख लिखा था जो दिल्ली से प्रकाशित उर्दू की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘सनद’ में प्रकाशित हुआ था। 1982 में वह रिटायर हो गये। गर्मियों में वह अपने किराये के आवास पर नैनीताल आये। एक दिन मेरे स्कूल आये और अपने साथ वोट हाउस कल्ब ले गये। वहाँ उन्हांेने पूछा कि अपना घर बनाया या नहीं ?मैं ने इनकार किया और अपनी सीमित तनख्वाह का हवाला देकर कहा कि कहाँ से बनाऊँ ?तब उन्हंे आश्र्चय हुआ और मुझसे बोले कि तुम्हारे कहने पर मैंने लोगों की लाखों रुपये की अपीलांे को इसीलिए निस्तारित किया कि तुम फायदा उठा सको। तुम वाकई बेवकूफ हो जो मु़फ्त में समाज सेवा करते रहे।
सितम्बर 1984 में उनका पत्र आया और मुझे लखनऊ बुलवाया। मैं सीधा शंकरनगर, डालीबाग में स्थित उनकी कोठी पर पहुँचा। ऊपरी मंजिल मंे अपने बराबर के कमरे में मेरा इन्तजाम किया। शाम को मेरे कमरे में आये तो मैं नमाज पढ़ रहा था। रात के खाने पर मिले तो कहने लगे, किसी वक्त की नमाज मेरे कमरे में भी पढ़ लेना। वहाँ कोई तस्वीरी कलेन्डर नहीं है।
अगले दिन दोपहर में आराम करने के बजाय मुझे अपने कमरे में बुलवा लिया और कहने लगे कि बराबर के प्लाट में तुम्हारे लिए मकान के निर्माण का ठेका दे दिया गया है। फ्रन्ट में पिं्रटिंग प्रेस लगेगा। कल बैंक जाकर तुम्हारा अकाउन्ट खुलवा दिया जायेगा और स्वामित्व के कुछ कागजात कचहरी मंे तैयार हो जायंेेगे। तुम नैनीताल की अपनी मुलाजमत छोड़ कर सपरिवार आ जाओ। मैं उनकी सारी बातें ध्यान से सुन रहा था। वह आत्मविश्वास से भरे हुए थे जैसे अपने बेटे को हिदायतें दी जाती हैं। फिर एक बुकशेल्फ के हिस्से को खींचा तो उसके पीछे एक छोटी सी अल्मारी और थी जिसमें ताला पड़ा था। उसे खोला और कहने लगे यह मेरे बैंक अकाउंट से अलग 47 लाख रुपये हंै जो कई वर्ष से यूँ ही पड़े हैं। इन्हें ठिकाने लगाना है। तुम प्रकाशन का कारोबार आरम्भ कर दो। काफी काम दिला दूंगा और तुम्हारी जिन्दगी आराम से गुजरेगी। मैंने 47 लाख रुपये की गडिडयाँ पहली बार देखी थीं। उस वक्त मेरी तन्ख्वाह 750/ रुपए मासिक थी। मैंने सोचने का वक्त मांगा और उसी दिन रात में नैनीताल वापसी कर ली। नैनीताल आकर मैंने सोच-विचार के पश्चात उन्हें इनकार का पत्र लिख दिया। उन्हांेने कोई शिकायत नहीं की। बीच-बीच मंे मैं उनसे मिलने जाता रहता था, मगर फिर कोई बात उन्हांेने इस सम्बन्ध में नहीं की। वह मुझसे बदस्तूर मुहब्बत करते थे और परिवार का सदस्य ही समझते थे।
वह अब इस दुनिया में नही हैं। फरवरी 1988 में उनका स्वर्गवास हो गया। वह स्वयं आर्यसमाजी थे। उनकी धर्मपत्नी सनातन धर्मी थीं मगर दोनों मंे कमाल का इश्क था। वह कट्टर हिन्दू थे, मुसलमानों के खिलाफ भी खुलकर बोलते थे। एक बार नैनीताल मंे कुछ मुसलमान मेहमानांे से उनकी वार्तालाप तल्खी में बदल गयी। दस-बारह लोग थे, मैंने शान्त करने के लिए उनसे कहा कि न तो यह लोग आपके कहने से हिन्दू हो जायंेगे और न इनकी दलीलों से आप कलमा पढ़कर मुसलमान हो जायेंगे, फिर ऐसी बातों से रिश्ते क्यों कड़वे किये जायंे। सब शांत हो गये और माहौल खुशगवार हो गया। वह मुझसे कहते थे कि तुम जैसे व्यापक दृष्टिकोण के मुसलमान पर मैं अपना हिन्दुत्व न्योछावर कर सकता हुँ। यह सुनकर मैं रो पड़ता था। यह मुहब्बत भी इन्तेहा थी और इंसानियत की बुलन्दी भी, जहाँ ऐसी बातें बेमानी हो जाती हैं। वह एक अजीब इन्सान थे। अब भी कभी-कभी ऐसा लगता है कि आज की डाक में उनका छपा हुआ पोस्टकार्ड जरूर आता होगा। उनकी अजमतों को याद रखे कभी-कभी रो लेता हूँ। अब शायद ऐसे लोगों की पैदाइश का साँचा खत्म हो गया है। आप जानिये कि इस तरह के लेख सियाही से नहीं; आँसुओं से लिखे जाते हैं।