विज्ञान जगत

GOUT (गाउट)

GOUT (गाउट)
डा॰ हिमानी पाण्डे बी॰ए॰एम॰एस॰, नैनीताल -

GOUT एक ऐसा रोग बन गया है कि जिससे कोई अन्जान नहीं है। आयुर्वेद में इस रोग को वातरक्त के नाम से जाना जाता है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, इस रोग में वात और रक्त दोनांे दूषित होते हैं।

कारण -
1.     खून में Uric Acid की मात्रा का बढ़ना।
2.     अधिक धूम्रपान या मधपान करना।
3.     अव्यायाम
4.     अध्यशन (भोजन करने के बाद पुनः भोजन करना)
अनशन (भोजन न करना)
विरूद्धाशन (दो विरोधी अन्न का एक साथ सेवन)
5.     पानी का कम पीना।
6.     मानसिक तनाव
7.     एस्प्रीन नामक दवा का ज्यादा प्रयोग करना।
8.     स्त्रियों में मैनोपांज (मासिक चक्र का बन्द होना)

स्थान -
तस्य स्थानंकरौ पादावडग्ल्यः सर्वसन्धयः।
कृत्वाऽऽदौ हस्तपादे तु मूलं देहे विद्यावति।।
(च. चः 29/12)
वातरक्त हाथ, पैर, अंगुलियां और सभी संधियों में स्थान बनाता है। हाथ और पैर में अपना मूलस्थान बनाकर पश्चात् सम्पूर्ण शरीर में दौरा करता है।
आयुर्वेद के अनुसार चोट लगने से या शरीर की वमन-विरेचन आदि द्वारा शुद्धि न करने से मनुष्य के शरीर में रक्त दूषित हो जाता है। इसके बाद जब वह व्यक्ति कटु, तिक्त, कषाय रसों का ज्यादा सेवन, अल्प एवं रूक्ष आहार का सेवन करने से, मूल-मूत्रादि वेगों को रोकने से वायु अधिक बढ़ जाती है।, ऐसी दशा में जब दूषित हुई वायु और रक्त शरीर में गमन करते हैं तो संधि स्थान में आकर रूक जाती है क्योंकि सभी संधियां टेढ़ी होती हैं। टेढ़े स्थान में सीधी गति नहीं हो सकती है। कुछ समय के लिए वहां अवश्य ही दोषों और दूष्यों को रूकना पड़ता है। इस प्रकार दोष आगे बढ़ते हैं, पर प्रत्येक दौरे में कुछ न कुछ उन संधियों में एकत्र हो जाते हैं जिससे रोग उत्पन्न होता है।

लक्षण-
1.     जोड़ो का शोथयुक्त (Swelling) एवं लालिमायुक्त होना।
2.     जोड़ों को छूने में दर्द होना।
3.     जोड़ों में असहनीय दर्द का होना।
4.     दर्द का अर्धरात्रि के बाद या सुबह को होना ज्यादा पाया गया है।
5.     दर्द और सूजन एक या दो सप्ताह बाद चली जाती है।
6.     दर्द दुबारा उसी जोड़ में या अन्य किसी जोड़ में भी हो सकता है।

जांच -
1.     खून में Uric Acid की मात्रा की जांच कराएं।
2.     जिस जोड़ में रोग हुआ है उसका X-ray कराएं।

चिकित्सा- आयुर्वेद के अनुसार चिकित्सा का मुख्य उद्देश्य
1.     आहार विहार के द्वारा अपने Metabolism को दुरूस्त करना।
2.     दूषित हुए वात और रक्त को प्राकृत अवस्था में लाना।
3.     वेदना, शोध लालिमा को कम करना।
4.     जोड़ों को मजबूत करना।
इसके लिए मुख्य जोर आहार-विहार पर जाता है, क्योंकि आपका आहार सही होगा तो औषधियों की आवश्यकता न्यून पड़ेगी। औषधियों, पंचकर्म, एवं प्राणायाम द्वारा इसकी चिकित्सा की जाती है।

क्या करें-
1.     भोजन के बाद एक सेब जरूर खाएं, इसमें Malic acid होता है जो Uric acid को neutralize करता है।
2.     आधा नीबू एक ग्लास पानी में डालकर सुबह-शाम पीयें। इसमें Citric acid होता है। जो Uric acid को dissolve करता है।
3.     रोज 8-10 गिलास पानी पिएं।
4.     एक कपड़े में बर्फ का टुकड़ा लपेटकर, लालिमा एवं शोधयुक्त स्थान में लगाएं। इससे तीव्र वेदना में थोड़ा आराम मिलेगा।
5.     ताजे फल एवं सब्जियों का प्रयोग करें।
6.     भोजन में सलाद का प्रयोग करें।

क्या न करें-
1.     प्रोटीन प्रधान अन्न का सेवन न करें जैसे राजमा, उड़द, चना आदि।
2.     मांस और मांस से बने पदार्थ का सेवन न करें।
3.     प्रोसेस्ड फूड जैसे व्हाइट ब्रैड का सेवन कम करें।
4.     भोजन में मिर्च, मसालों को प्रयोग न करें।
5.     धूम्रपान एवं मधपान का सेवन न करें।
6.     मटर, फूलगाभी, पालक, मशरूम का प्रयोग भोजन में न करें क्योेंकि इनमें Purine की मात्रा ज्यादा होने से ये Uric acid में परिवर्तित हो जाते हैं।