अवर्गिकृत

Tuberculosis राजयक्ष्मा

डा॰ हिमानी पाण्डे बी॰ए॰एम॰एस॰, नैनीताल -

आयुर्वेद में वर्णित अनेक गंभीर स्वरूप के व्याधियों में से एक महत्वपूर्ण विकार है राजयक्ष्मा व्याधि। जिसे शोष, क्षय, यक्ष्मा, रोगराज जैसे विविध नामों से भी जाना जाता है।
इसके विविध नामों के पीछे भी अनेक कारण हैं-यह विकार सबसे पहले नक्षत्रों के राजा (चन्द्र) को हुआ था, इसीलिए राजयक्ष्मा कहा जाता है। यह शरीर तथा औषध-द्रव्यों की शक्ति का क्षय करता है और इसके कारण शरीरस्थ धातुओं का क्षय होना शुरू हो जाता है। इस कारण इसे क्षय भी कहा जाता है। यह शरीर में स्थित रसादि धातुओं को अनुलोम अथवा अथवा विलोम गति से सुखा देता है, इसीलिए यह शोष नाम से भी जाना जाता है। समस्त रोगों में प्रधान होने के कारण इसे रोगराज के नाम से भी जाना जाता है।

आयुर्वेद के आचार्य चरक ने भी इसे ‘सवरोगाग्रजो बली’ कहकर सारे ही विकारों में बलवान बताया है।
कारण- आयुर्वेद के अनुसार साहस, संधारण, क्षय और विषमाशन यह राजयक्ष्मा व्याधि को उत्पन्न करने वाले बताए गए हैं-
1. साहस- अपनी क्षमता से अधिक शारीरिक श्रम करने को साहस कहते हैं। अपने से बलवान व्यक्ति से युð या कुश्ती करना, पानी में अधिक दूर तक तैरना, शक्ति से अधिक भार उठाना आदि।
ग्रंथों में कहा गया है कि अपनी क्षमता न होते हुए भी इस प्रकार के कार्य करने से मनुष्य का उरः स्थल (lungs), क्षत (injury) हो जाता है। उरः क्षत होने से (lung injury) वात प्रकोप और फिर राजयक्ष्मा की उत्पत्ति होती है। इसलिए बुðिमान पुरूष अपने शारीरिक बल को देखकर उसके अनुसार कार्य करे।
2. संधारण- संधारण अर्थात् अधारणीय वेगों को धारण करना। वेग मालूम पड़ने पर भी उसे रोकने का प्रयत्न करना वेगावरोध होता है। अर्थात् भय, लज्जा, घृणा के कारण वात, मल, मूत्र के आए हुए वेगों को रोकने से वायु प्रकुपित हो जाती है। प्रकुपित वायु प्रतिलोम अर्थात् विरूð दिशा में जाकर पित्त और कफ को भी प्रकुपित कर देता है। जिससे सम्पूर्ण शरीर में वात, पित्त, कफ प्रकुपित अवस्था को प्राप्त होकर रोग उत्पन्न करते हैं।
3. क्षय- जब मनुष्य शोक, चिन्तादि भावों से ग्रस्त रहता हो और ऐसे व्यक्ति जो पहले से ही कृश होने पर भी रूक्ष अन्नपान का सेवन करते हैं, कम मात्रा में भोजन करते हो, तो उनमें रसधातु (Plasma) क्षीण हो जाता है। रस धातु क्षीण होने से शीष उत्पन्न होता है और चिकित्सा के अभाव में यक्ष्मा रोग के लक्षण उत्पन्न होते हैं।
4. विषमाशन- विषमाशन अर्थात् कभी भूख की तुलना में अत्यधिक भोजन करना या कभी इतनी कम मात्रा में करना की शरीर को कोई पोषण भी ना मिल सके। विषम आहार-विहार का सेवन करने से त्रिदोष भी विषम हो जाते हैं। जब यह दूषित स्रोतस (Channels) के मार्गों में व्याप्त हो जाते हैं तब मनुष्य जो भी आहार का सेवन करता है, उसका अधिकांश भाग मल-मूत्र में परिवर्तित हो जाता है। ऐसी स्थिति में धातुओं की उत्पत्ति तो होती ही नहीं बल्कि पोषण भी नहीं होता है। व्यक्ति केवल मल के बल पर ही जीवित रहता है। इसलिए (राजयक्ष्मा) रोग से पीडि़त पुरूष के मल की विशेष रूप से रक्षा करनी चाहिए, साथ ही अतिकृश और दुर्बलों की भी मल की रक्षा करनी चाहिए।
लक्षण- आयुर्वेद के अनुसार लक्षणों के आधार पर राज्यक्ष्मा के त्रिरूप, षड्रूप, एकादशरूप ऐसे प्रकार किए जाते हैं। जैसे-जैसे व्याधि गम्भीर स्वरूप प्राप्त करती है। वैसे-वैसे लक्षण भी बढ़ने लगते हैं और त्रिरूप दर्शाने वाला राजयक्ष्मा का मरीज षड्रूप राजक्ष्मा और फिर एकादश रूप राजयक्ष्मा मेें परिवर्तित हो जाता है।